सफरनामा
उलझें उलझे हालात मेरे,
कहानी जाने क्या होगा ,
राहे जिसकी मालूम नही
सफ़र अंजामे क्या होगा ।
लहरे टकराती जब साहिल से
जी मे कसक इक उठती है ,
कश्तियां परवान जो चढ़ रही
उतार न जाने क्या होगा ।
सोई धड़कन आबाद हो रही
अजब बदहवासी का आलम है ,
कोरे पन्ने पलट रही हु
अल्फाज़ न जाने क्या होगा ।
*जयप्रखर*

