नैन खोलो सखी !
अब बसंत आ गया ...
फैली खेतो में हरिया
कुसमित हुई डालियां
झूम - झूम आम ,सरसो
करे प्रीत की बतिया
गांव गलियों में फिर से उमंग भर गया
नैन खोलो सखी !
बसंत आ गया ...
मस्त अल्हड़ बसंती
हवा जो चली
चटकी कलियाँ खिली डली की डली
खिले टेशु
भरे महुआ भी रस माधुरी
अब तो बादल से भी पीत रंग झर गया
नैन खोलो सखी
बसंत आ गया ....
धरती यु है सजी कि
दुल्हन सज गई
बैठ फूलों की डोली में
सज के चली
महके बन बाग़ , कोयल तान भरने लगी
प्रेम होके मुदित मन गीत गाने लगा
नैन खोलो सखी !
प्रिय बसंत आ गया ....
** जयप्रखर **

